श्रीमद्भागवत कथा में उमड़ा भक्तिरस, श्रीकृष्ण जन्मोत्सव वर्णन से भावविभोर हुए श्रद्धालु
हरिद्वार। खड़खड़ी स्थित प्रसिद्ध श्री संत मंडल आश्रम में महामंडलेश्वर प्रातः स्मरणीय परम पूज्य श्री राम मुनि जी महाराज के दिव्य एवं पावन सानिध्य में प्रख्यात कथा व्यास श्रद्धेय श्री पुष्पक भाई शुक्ला जी के श्रीमुख से प्रवाहित हो रही श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के दौरान आज संपूर्ण वातावरण भक्तिरस, प्रेम और आध्यात्मिक चेतना से सराबोर हो उठा।
कथा आरंभ होते ही भक्ति की ऐसी अविरल धारा प्रवाहित हुई कि उपस्थित श्रद्धालु स्वयं को वृंदावन की दिव्य लीलाओं के मध्य अनुभव करने लगे। कथा व्यास श्री पुष्पक भाई शुक्ला जी ने भगवान श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का अत्यंत मार्मिक एवं हृदयस्पर्शी वर्णन करते हुए कहा कि जब-जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है, तब-तब प्रभु भक्तों के उद्धार हेतु अवतरित होते हैं। उन्होंने गीता का प्रसिद्ध श्लोक उद्धृत करते हुए कहा—
“परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥”
उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म केवल मथुरा में नहीं, बल्कि प्रत्येक भक्त के निर्मल हृदय में होता है। जिस हृदय में प्रेम, दया, करुणा और भक्ति का वास होता है, वही वास्तविक गोकुल बन जाता है।
कथा के दौरान भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य की झांकी प्रस्तुत होते ही पूरा पंडाल “नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की” के जयघोषों से गुंजायमान हो उठा। श्रद्धालु भजन-कीर्तन, नृत्य और उत्सव में ऐसे लीन हुए मानो द्वापर युग की लीलाएं सजीव हो उठी हों।
रुक्मिणी विवाह प्रसंग का वर्णन करते हुए कथा व्यास ने सच्चे प्रेम की व्याख्या करते हुए कहा कि प्रेम में समर्पण, त्याग और प्रभु के प्रति अटूट श्रद्धा आवश्यक है। उन्होंने भक्ति मार्ग का महत्व बताते हुए श्लोक सुनाया—
“श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥”
उन्होंने कहा कि जो मनुष्य भगवान के नाम, रूप, लीला और कथा में मन लगाता है, उसका जीवन स्वतः आनंद और शांति से परिपूर्ण हो जाता है। श्रीमद्भागवत केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि कलियुग में जीवात्मा के कल्याण का दिव्य अमृत है।
कथा के मध्य महामंडलेश्वर परम पूज्य श्री राम मुनि जी महाराज ने भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि आज मनुष्य भौतिक चकाचौंध में अपने वास्तविक स्वरूप को भूलता जा रहा है। भक्ति ही वह मार्ग है जो आत्मिक शांति और परम सत्य की ओर ले जाता है। उन्होंने कहा—
“कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यता।
हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्॥”
महाराज श्री ने बताया कि कलियुग में भगवान के नाम से बढ़कर कोई साधन नहीं है। सांसारिक सुख क्षणभंगुर हैं, जबकि प्रभु का नाम और सत्संग शाश्वत आनंद प्रदान करते हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि प्रतिदिन कुछ समय प्रभु स्मरण, सत्संग और सेवा के लिए अवश्य निकालें।
कथा स्थल पर उपस्थित श्रद्धालु भावविभोर होकर भक्ति रस में डूब गए। किसी की आंखों से प्रेमाश्रु बह रहे थे तो कोई “राधे-श्याम” के जयघोष में लीन था। संपूर्ण आश्रम भजनों, मंत्रोच्चार और हरिनाम संकीर्तन से ऐसा आलोकित हो उठा मानो गोलोक धाम पृथ्वी पर अवतरित हो गया हो।
कार्यक्रम के अंत में आरती एवं प्रसाद वितरण के साथ भक्तिमय वातावरण बना रहा। श्रद्धालु अपने हृदय में अद्भुत शांति, आनंद और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव करते हुए लौटे।
इस अवसर पर यजमान श्री पंकज पांड्या, भारती पांचाल, बाबू भाई सतवारा, श्री ओमप्रकाश सोनी, अशोक त्रिवेदी, कमलेश त्रिवेदी, उमा भाई त्रिवेदी, पारसमल, मनीष पांडे, मीरा बेन भावसाल सहित अहमदाबाद (गुजरात) से पधारे अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे।

