जब संत बनीं ममता की मूर्ति: ज्वालापुर सराय में महामंडलेश्वर डॉ. हर्षिता जी महाराज ने जगाई शिक्षा की अलख

जब संत बनीं ममता की मूर्ति: ज्वालापुर सराय में महामंडलेश्वर डॉ. हर्षिता जी महाराज ने जगाई शिक्षा की अलख
कॉपी-किताब, पेंसिल, बैग और वस्त्र पाकर खिल उठे मासूम चेहरे — सेवा, करुणा और संस्कार का अद्भुत संगम
हरिद्वार।
कहते हैं कि भगवान हर जगह स्वयं नहीं पहुंच सकते, इसलिए वे धरती पर ऐसे दिव्य व्यक्तित्वों को भेजते हैं जो मानवता की सेवा को ही अपना धर्म मान लेते हैं। ज्वालापुर सराय में आज ऐसा ही भावुक और प्रेरणादायक दृश्य देखने को मिला, जब महामंडलेश्वर डॉ. हर्षिता जी महाराज गरीब और जरूरतमंद बच्चों के बीच एक संत ही नहीं, बल्कि एक ममतामयी मां के रूप में पहुंचीं।
उनकी स्नेहभरी उपस्थिति ने पूरे वातावरण को करुणा और अपनत्व से भर दिया। बच्चों को जब उनके हाथों से कॉपी, किताब, पेंसिल और अन्य शैक्षणिक सामग्री मिली, तो उनके चेहरों पर खिली मुस्कान ने मानो हर दिल को छू लिया। कई बच्चों की आंखों में वो सपने साफ दिखाई दिए, जिन्हें अब तक गरीबी ने दबाकर रखा था।
महामंडलेश्वर डॉ. हर्षिता जी महाराज ने बच्चों को आशीर्वाद देते हुए कहा—
“गरीब बच्चे किसी बोझ नहीं, बल्कि देश का उज्ज्वल भविष्य हैं। एक किताब किसी भी बच्चे की तकदीर बदल सकती है। हमारा प्रयास रहेगा कि कोई भी बच्चा अभाव में अपना सपना न खोए।”
उन्होंने आगे घोषणा की कि गुरु श्री गोरखनाथ जी अलख अखाड़ा परिषद की ओर से हर माह बच्चों को शिक्षा से जुड़ी सामग्री, स्कूल बैग, वस्त्र, टी-शर्ट एवं अन्य आवश्यक वस्तुएं निरंतर वितरित की जाएंगी।
🌼 सेवा को मिला सम्मान: मां गंगा सेवा संस्थान ने बनाया संरक्षक
इस भावपूर्ण आयोजन के दौरान एक गौरवपूर्ण क्षण तब आया जब मां गंगा सेवा संस्थान ने महामंडलेश्वर डॉ. हर्षिता जी महाराज को अपना संरक्षक नियुक्त किया। संस्था के पदाधिकारियों ने कहा कि हर्षिता महाराज जी केवल एक संत नहीं, बल्कि हजारों जरूरतमंदों के लिए आशा, विश्वास और सहारा बन चुकी हैं।
🌟 संतों की उपस्थिति से धन्य हुआ आयोजन
इस पावन अवसर पर महंत संजीवन नाथ महाराज, विवेक कुमार दुबे सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति एवं क्षेत्रवासी उपस्थित रहे। सभी ने इस सेवा कार्य की भूरी-भूरी प्रशंसा की और इसे समाज के लिए एक प्रेरणादायक पहल बताया।
✨ भावपूर्ण समापन
पूरा वातावरण सेवा, संस्कार, करुणा और मानवता की भावना से ओत-प्रोत रहा। छोटे-छोटे बच्चों की मुस्कान मानो यही संदेश दे रही थी—
“जहां संतों का आशीर्वाद और सेवा का भाव होता है, वहां किसी भी भविष्य पर अंधकार नहीं छा सकता।”
यह आयोजन केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि मानवता की उस जीवंत मिसाल का प्रतीक बना, जहां सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है और शिक्षा ही सबसे बड़ी शक्ति।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!