गुरु पूर्णिमा महापर्व पर उमड़ा श्रद्धा का सागर
गुरु कृपा से ही जीवन होता है धन्य – स्वामी अकामानंद जी महाराज
हरिद्वार | गाजीवाला, आर्य नगर कांगड़ी स्थित श्री कृष्ण परमधाम आश्रम में प्रातः स्मरणीय गुरु भगवान परम पूज्य स्वामी अकामानंद जी महाराज के पावन सानिध्य में गुरु पूर्णिमा महापर्व अत्यंत श्रद्धा, भक्ति, उल्लास एवं दिव्य आध्यात्मिक गरिमा के साथ मनाया गया। इस पावन अवसर पर देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु आश्रम पहुंचे और गुरु चरणों में पुष्प, फल, वस्त्र एवं श्रद्धा-सुमन अर्पित कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
प्रातःकाल से ही आश्रम परिसर गुरु भक्ति के जयघोष, वेद मंत्रों की गूंज और मधुर भजन-कीर्तन से भक्तिमय वातावरण में सराबोर रहा। श्रद्धालुओं की अपार भीड़ और उनकी आस्था ने इस महापर्व को और अधिक दिव्य एवं भव्य बना दिया।
इस अवसर पर देश के प्रख्यात कथा व्यास स्वामी अकामानंद जी महाराज ने गुरु पूर्णिमा की महिमा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि गुरु केवल एक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि वह दिव्य चेतना हैं जो अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाती है। गुरु ही शिष्य को आत्मबोध, धर्म, भक्ति, सेवा और मानवता का सच्चा मार्ग दिखाते हैं। उन्होंने कहा कि जिस जीवन में गुरु का सानिध्य प्राप्त हो जाता है, उसका जीवन धन्य, सफल और कृतार्थ हो जाता है।
स्वामी जी ने आगे कहा कि गुरु पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि गुरु के प्रति समर्पण, कृतज्ञता और श्रद्धा प्रकट करने का दिव्य अवसर है। गुरु कृपा से ही भक्ति दृढ़ होती है, ज्ञान का उदय होता है और जीवन में सदाचार, संयम तथा आत्मविश्वास का संचार होता है। गुरु की शरण में रहकर ही मनुष्य सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर ईश्वर की अनुभूति कर सकता है।
उन्होंने सभी श्रद्धालुओं का आह्वान किया कि वे गुरु द्वारा बताए गए सत्य, सेवा, प्रेम, करुणा और सदाचार के मार्ग पर चलकर अपने जीवन को लोकमंगल एवं राष्ट्रसेवा के लिए समर्पित करें। यही गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि और वास्तविक गुरु-दक्षिणा है।
कार्यक्रम के अंत में विधिवत गुरु पूजन, आरती, भजन-कीर्तन एवं विशाल प्रसाद वितरण किया गया। श्रद्धालुओं ने गुरु महाराज का आशीर्वाद प्राप्त कर अपने जीवन में आध्यात्मिक उन्नति एवं विश्व कल्याण की मंगलकामना की। संपूर्ण वातावरण गुरु भक्ति, श्रद्धा और दिव्य ऊर्जा से अनुप्राणित रहा।
विशेष उल्लेखनीय:
श्री कृष्ण परमधाम आश्रम में प्रत्येक अमावस्या एवं पूर्णिमा के पावन अवसर पर भव्य भंडारे का आयोजन किया जाता है, जिसमें संत-महात्माओं एवं श्रद्धालुओं को श्रद्धापूर्वक भोजन प्रसाद वितरित किया जाता है। यह परंपरा सेवा, समर्पण और सनातन संस्कृति के जीवंत स्वरूप का अनुपम उदाहरण है।
परम पूज्य स्वामी अकामानंद जी महाराज केवल एक संत नहीं, बल्कि युगद्रष्टा, करुणामूर्ति एवं दिव्य चेतना के स्रोत हैं। उनका सानिध्य जीवन को दिशा देता है, उनका आशीर्वाद आत्मा को प्रकाशमान करता है और उनके उपदेश मानवता को सच्चे मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। ऐसे सद्गुरु का मिलना परम सौभाग्य है, जिनकी कृपा से जीवन सार्थक, सफल और परम शांति से परिपूर्ण हो जाता है।

