भक्ति और वैराग्य: मानव जीवन के दो परम कल्याणकारी स्तंभ

भक्ति और वैराग्य: मानव जीवन के दो परम कल्याणकारी स्तंभ
हरिद्वार। पावन नगरी हरिद्वार के भूपतवाला स्थित प्रसिद्ध गंगा इंटरनेशनल में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के पावन अवसर पर परम पूज्य धीरज कृष्ण शास्त्री जी महाराज ने श्रद्धालुओं को भक्ति और वैराग्य के गहन रहस्य से अवगत कराया। यह आयोजन दादा नागरमल जी एवं दादा श्री रामधारी मल जी सहित समस्त पितरों की पुण्य स्मृति में तर्पण हेतु संपन्न हुआ।
महाराज श्री ने अपने ओजस्वी प्रवचन में कहा कि जब तक मनुष्य के जीवन में भक्ति और वैराग्य दोनों का समन्वय नहीं होता, तब तक उसकी भक्ति पूर्ण फलदायी नहीं हो सकती। उन्होंने भक्ति को ईश्वर के प्रति निष्काम, निश्छल और अनन्य प्रेम बताया। उनके अनुसार, केवल पूजा-पाठ या मंत्र जाप ही भक्ति नहीं है, बल्कि आत्मा का परमात्मा में पूर्ण समर्पण ही सच्ची भक्ति है।
वैराग्य की व्याख्या करते हुए महाराज जी ने कहा कि वैराग्य का अर्थ संसार का त्याग नहीं, बल्कि संसार के प्रति मोह का त्याग है। व्यक्ति संसार में रहते हुए भी कमल की भांति निर्लिप्त रह सकता है। जब मनुष्य के भीतर से वासनाएं, अहंकार और मोह समाप्त हो जाते हैं, तभी सच्चे वैराग्य का उदय होता है।
उन्होंने श्रीमद्भागवत महापुराण का उल्लेख करते हुए बताया कि भक्ति देवी के दो पुत्र हैं—ज्ञान और वैराग्य। इन दोनों के बिना भक्ति अधूरी है। यदि मनुष्य के भीतर वैराग्य नहीं होगा, तो उसका मन संसारिक आकर्षणों में भटकता रहेगा और ईश्वर में एकाग्रता संभव नहीं हो पाएगी।
महाराज जी ने स्पष्ट कहा कि वैराग्य मन को शुद्ध करता है और उसी शुद्ध मन में भक्ति का वास होता है। बिना वैराग्य के की गई भक्ति केवल आडंबर बनकर रह जाती है। जब मनुष्य यह समझ लेता है कि संसार नश्वर है और केवल भगवान ही शाश्वत हैं, तब उसकी भक्ति सच्चे अर्थों में फलित होती है।
व्यावहारिक जीवन में भक्ति और वैराग्य को अपनाने के लिए उन्होंने सरल उपाय बताए—अपने कर्तव्यों का पालन करें, लेकिन मोह में न फंसें; संतोष का भाव रखें; लोभ और तृष्णा से दूर रहें; तथा निरंतर प्रभु नाम का स्मरण करते रहें।
कथा के अंत में उन्होंने कहा कि भक्ति हमें प्रभु के प्रेम में डुबोती है और वैराग्य हमें संसार के दुखों से ऊपर उठना सिखाता है। जब ये दोनों गुण जीवन में आ जाते हैं, तभी मानव जीवन सार्थक और धन्य बनता है।
इस अवसर पर गर्ग परिवार से श्री निरंजन दास जी एवं उनके परिवारजन सहित अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे और कथा का लाभ प्राप्त किया। :::

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