हरिद्वार में अतिक्रमण पर बुलडोजर की गरज, अगले ही दिन फिर कब्ज़ा — आखिर किसकी शह पर चल रहा खेल?


हरिद्वार। धर्मनगरी Haridwar में अतिक्रमण के खिलाफ प्रशासन की कार्रवाई एक बार फिर सवालों के घेरे में है। बस अड्डा और रेलवे स्टेशन क्षेत्र में एक दिन बुलडोजर की गरज सुनाई देती है, तो अगले ही दिन वहीं फिर से अस्थायी दुकानें और कब्ज़े नजर आने लगते हैं। आखिर यह सब किसकी शह पर हो रहा है?
हाल ही में प्रशासन ने बस अड्डा और Indian Railways से जुड़े रेलवे स्टेशन परिसर के आसपास अवैध कब्जों पर सख्त कार्रवाई की। फुटपाथों और सड़कों के किनारे बने अस्थायी ढांचों को हटाया गया, अतिक्रमणकारियों को चेतावनी दी गई और क्षेत्र को आमजन के लिए सुगम बनाने का दावा किया गया।
लेकिन कार्रवाई के 24 घंटे भी नहीं बीते कि हालात फिर पुराने ढर्रे पर लौटते दिखाई दिए। वही ठेले, वही तिरपाल, वही अव्यवस्थित भीड़ — मानो बुलडोजर की गर्जना सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई हो।
🟢 बुलडोजर की गर्जना बनाम सिस्टम की चुप्पी
स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन की यह कार्रवाई केवल दिखावे तक सीमित रहती है। यदि सच में सख्ती हो, तो दोबारा कब्ज़ा संभव ही नहीं हो सकता। सवाल उठ रहा है कि क्या कुछ प्रभावशाली लोगों की मौन सहमति से यह खेल चल रहा है?
एक ओर प्रशासन अतिक्रमण हटाने का दावा करता है, दूसरी ओर दोबारा बसते कब्ज़े उसकी कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न खड़े कर रहे हैं।
🟢 सरकारी तंत्र का दुरुपयोग या केवल औपचारिकता?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लगातार निगरानी और ठोस नीति न हो, तो इस तरह की कार्रवाइयाँ केवल औपचारिकता बनकर रह जाती हैं। बार-बार बुलडोजर चलाना और फिर स्थिति का यथावत हो जाना, सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग जैसा प्रतीत होता है।
क्या यह प्रशासनिक लापरवाही है या किसी प्रकार का संरक्षण? यह प्रश्न अब आम नागरिकों की जुबान पर है।
🟢 फुटपाथ किसके लिए — जनता या कब्ज़ाधारियों के लिए?
फुटपाथ आम जनता की सुविधा और सुरक्षित आवागमन के लिए बनाए जाते हैं। लेकिन जब इन्हीं पर अवैध कब्ज़े हो जाते हैं, तो पैदल चलने वाले लोग सड़क पर उतरने को मजबूर हो जाते हैं, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है।
बस अड्डा और रेलवे स्टेशन जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में अतिक्रमण न केवल यातायात व्यवस्था को प्रभावित करता है, बल्कि शहर की छवि को भी धूमिल करता है।
अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन स्थायी समाधान की दिशा में कदम उठाएगा, या फिर बुलडोजर की गर्जना और सिस्टम की चुप्पी का यह सिलसिला यूँ ही चलता रहेगा?
हरिद्वार की जनता अब केवल कार्रवाई नहीं, बल्कि स्थायी व्यवस्था और जवाबदेही चाहती है।

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