श्रीचंद्र जयंती पर संतों की हुंकार—धर्म, संस्कृति और सनातन परंपराओं के संरक्षण का लिया संकल्प
श्री जगत राम उदासीन आश्रम में गूंजा उदासीनाचार्य भगवान श्रीचंद्र जी महाराज का मानव कल्याण एवं सेवा का संदेश
हरिद्वार, 22 सितंबर 2026। कनखल स्थित प्रसिद्ध श्री जगत राम उदासीन आश्रम में उदासीनाचार्य जगतगुरु भगवान श्रीचंद्र जी महाराज की जयंती के पावन अवसर पर महामंडलेश्वर प्रातः स्मरणीय गुरु भगवान परम पूज्य श्री सुरेंद्र मुनि जी महाराज की पतित पावन कृपा तथा आश्रम के श्रीमहंत परम पूज्य परमात्मा स्वरूप श्री सुतीक्ष्ण मुनि जी महाराज के पावन सानिध्य में विशाल संत समागम एवं संत भंडारे का आयोजन श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण में किया गया। देशभर से पहुंचे संत-महापुरुषों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति से आयोजन की शोभा बढ़ाई।
संत समागम में उदासीनाचार्य जगतगुरु भगवान श्रीचंद्र जी महाराज के त्याग, तपस्या, सेवा, वैराग्य और मानव कल्याण के संदेश को स्मरण करते हुए धर्म, संस्कृति एवं सनातन परंपराओं के संरक्षण और उत्थान का संकल्प लिया गया।
श्रीचंद्र जी महाराज का जीवन मानवता के लिए प्रेरणा
संत-महापुरुषों ने कहा कि भगवान श्रीचंद्र जी महाराज का जीवन त्याग, तपस्या, वैराग्य और लोककल्याण की अनुपम मिसाल है। उन्होंने मानव मात्र को सत्य, संयम, सेवा, सदाचार और आध्यात्मिक साधना का मार्ग दिखाया। श्रीचंद्र जयंती केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, सेवा और सदाचार के संकल्प का पावन अवसर है।
महामंडलेश्वर श्री करौली शंकर महाराज ने कहा कि संतों की वाणी समाज को सद्मार्ग दिखाने वाली प्रकाश की किरण है। भारतीय सनातन संस्कृति में संत परंपरा ने सदैव मानवता को सत्य, सेवा, संयम और सदाचार का मार्ग दिखाया है। आज आवश्यकता है कि हम अपनी महान आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़ें और युवा पीढ़ी को भी धर्म, संस्कार एवं संस्कृति से जोड़ें।
श्रीमहंत सुतीक्ष्ण मुनि जी महाराज ने कहा कि सतगुरु की महिमा अपार है। सतगुरु द्वारा दिखाया गया मार्ग मनुष्य के जीवन को सार्थकता की ओर ले जाता है। संत समागम केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और समाज को संस्कारवान बनाने का पवित्र माध्यम है।
महंत जगजीत सिंह जी महाराज ने कहा कि सनातन धर्म की शक्ति उसकी महान संत परंपरा और संस्कारों में निहित है। धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि प्रत्येक प्राणी के प्रति प्रेम, करुणा, सेवा और सद्भाव की भावना भी धर्म का अभिन्न अंग है।
महंत विष्णु दास जी महाराज ने कहा कि संतों के चरणों में बैठकर प्राप्त होने वाला ज्ञान मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है। सत्संग और संत सेवा के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर के अज्ञान का अंधकार दूर कर प्रभु के प्रकाश की ओर अग्रसर होता है।
श्रीमहंत रघुवीर दास जी महाराज ने कहा कि भगवान का नाम और संतों का सानिध्य मनुष्य जीवन को भवसागर से पार लगाने वाला सच्चा आधार है।
नया उदासीन अखाड़े के कोठारी श्री नितिजी दास माना जी महाराज ने कहा—“गुरु महिमा अनंत है, जो जाने भव पार। जो सतगुरु की शरण में आ जाते हैं, उनका जीवन सार्थक हो जाता है।”
महंत मोहन सिंह जी महाराज ने कहा कि संत-महापुरुष समाज के मार्गदर्शक हैं। उनके तप, त्याग और सेवा से ही धर्म एवं संस्कृति की ध्वजा सदैव ऊंची रही है।
गुरु महाराज के सानिध्य को बताया जीवन का सौभाग्य
इस अवसर पर गुरु महाराज परम पूज्य श्री सुरेंद्र मुनि जी महाराज की महिमा का स्मरण करते हुए संतों ने कहा कि गुरु का सानिध्य मनुष्य के जीवन में आध्यात्मिक प्रकाश का संचार करता है। गुरु अज्ञान से ज्ञान, असत्य से सत्य और सांसारिक मोह से आत्मबोध की ओर ले जाने वाली शक्ति हैं। गुरु महाराज की कृपा और आशीर्वाद साधक के जीवन की बड़ी आध्यात्मिक पूंजी है।
संत भंडारे में संत-महापुरुषों का हुआ सम्मान
विशाल संत भंडारे में संत-महापुरुषों का विधिवत पूजन एवं सम्मान कर उन्हें श्रद्धापूर्वक भोजन प्रसाद ग्रहण कराया गया। आश्रम परिसर संतों के जयघोष, भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर रहा। बड़ी संख्या में श्रद्धालु भक्तों ने संत समागम में पहुंचकर संत-महापुरुषों का आशीर्वाद प्राप्त किया।
आयोजन में सभी 13 अखाड़ों के संत-महापुरुषों सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं भक्त उपस्थित रहे। इस अवसर पर परम पूज्य महंत भगतराम, महंत आकाश मुनि, महामंडलेश्वर राम मुनि महाराज, महामंडलेश्वर सुरेश मुनि महाराज, महामंडलेश्वर रामेश्वरानंद महाराज, आचार्य महंत रविदेव महाराज सहित अनेक संत-महापुरुषों के श्रीमुख से पावन वचन सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।
संत-महापुरुषों ने सामूहिक रूप से धर्म, अध्यात्म, सेवा, संस्कार और सनातन संस्कृति के संरक्षण का संदेश देते हुए समाज को एकजुट होकर सद्मार्ग पर चलने का आह्वान किया।
रिपोर्टर: पूजा शर्मा
हरिद्वार, उत्तराखंड
22 सितंबर 2026
श्रीचंद्र जयंती पर संतों की हुंकार—धर्म, संस्कृति और सनातन परंपराओं के संरक्षण का लिया संकल्प






