हरिद्वार। ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ को लेकर हरिद्वार के प्राचीन अवधूत मंडल आश्रम, ज्वालापुर स्थित श्री जी वाटिका में संत समागम का आयोजन किया गया। समागम में विभिन्न अखाड़ों के वरिष्ठ संतों के साथ केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, स्वामी रामदेव सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
समागम में श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन के महामंडलेश्वर करौली शंकर जी महाराज ने ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ के समर्थन में अपना स्पष्ट और तर्कपूर्ण दृष्टिकोण रखा। उन्होंने कहा कि इस विषय को राजनीतिक दलों के फायदे-नुकसान से ऊपर उठकर राष्ट्रहित, लोकतंत्र की मजबूती और देश की प्रगति के नजरिए से देखा जाना चाहिए।
धर्मगद्दी और राजगद्दी का एक मंच पर आना सकारात्मक संदेश
करौली शंकर जी महाराज ने कहा कि भारत में धर्मगद्दी और राजगद्दी ने सदैव राष्ट्रहित से जुड़े विषयों पर मार्गदर्शन और विचार-विमर्श की परंपरा निभाई है। ऐसे में संत समाज और सरकार का किसी राष्ट्रीय विषय पर एक मंच पर चिंतन करना देश और दुनिया के लिए सकारात्मक संदेश है।
राजनीतिक लाभ नहीं, राष्ट्रहित होना चाहिए आधार
‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ को लेकर उठ रही आशंकाओं पर उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था पर चर्चा राजनीतिक दलों के हित को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि राष्ट्रहित को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि भारत अनेक भाषाओं, संस्कृतियों और परंपराओं वाला देश होने के बावजूद एक राष्ट्र है। ऐसे में पूरे देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की व्यवस्था पर गंभीरता से विचार किया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि देश में पहले लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होने की व्यवस्था रही है।
“सिर्फ चुनावी खर्च की बचत नहीं, देश की प्रगति देखनी है”
करौली शंकर जी ने कहा कि ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ की बहस को केवल चुनावी खर्च में होने वाली बचत तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि असली प्राथमिकता देश की प्रगति, लोकतंत्र की मजबूती और राष्ट्रीय सुरक्षा होनी चाहिए।
उन्होंने ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ को देश के लिए “सार्थक और जरूरी कदम” बताते हुए कहा कि इस विषय पर व्यापक और सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ विचार किया जाना चाहिए।
मतदाता अपने विवेक से तय करेगा किसे वोट देना है
एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव होने पर किसी एक राजनीतिक दल को संभावित लाभ मिलने की आशंका पर करौली शंकर जी ने भारतीय मतदाता की समझदारी का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय मतदाता अलग-अलग स्तर के चुनावों में अलग-अलग निर्णय लेने में सक्षम है।
उन्होंने दिल्ली के चुनावों का उल्लेख करते हुए कहा कि एक साथ चुनाव होने का यह अर्थ कतई नहीं है कि मतदाता लोकसभा और विधानसभा दोनों स्तरों पर एक ही राजनीतिक दल को वोट देगा। अंतिम निर्णय हमेशा मतदाता के विवेक और उसकी पसंद पर निर्भर करता है।
राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के सम्मान पर भी दिया सुझाव
अपने संबोधन के अंत में करौली शंकर जी महाराज ने राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान को लेकर भी कड़ा सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत के अपमान का दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति के मताधिकार पर भी कार्रवाई किए जाने के विषय पर विचार किया जाना चाहिए।
करौली शंकर जी का स्पष्ट संदेश
करौली शंकर जी महाराज के संबोधन का मूल संदेश स्पष्ट रहा कि ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ को केवल राजनीतिक दलों के फायदे या नुकसान के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। इस व्यवस्था पर विचार करते समय देश की प्रगति, लोकतंत्र की मजबूती, राष्ट्रीय सुरक्षा और मतदाता के विवेक को केंद्र में रखना जरूरी है।
हरिद्वार में आयोजित यह संत समागम ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय विषय पर संत समाज की भागीदारी और उसके दृष्टिकोण को सामने लाने वाला महत्वपूर्ण मंच बना।






