श्रीगुरुपूर्णिमा महोत्सव श्रद्धा, भक्ति एवं गुरु-समर्पण के साथ सम्पन्न
हरिद्वार। “श्रीगुरुपूर्णिमा महोत्सव” के परम-पावन अवसर पर श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य, श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ, अनन्तश्रीविभूषित पूज्यपाद जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर पूज्य गुरुदेव श्री स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज “पूज्य आचार्यश्री जी” के पावन सान्निध्य में श्रीपञ्चदशनाम जूना अखाड़ा की आचार्यपीठ (गुरुगद्दी), श्री हरिहर आश्रम, कनखल (हरिद्वार) में श्रीगुरुपूर्णिमा महोत्सव अत्यंत श्रद्धा, भक्ति एवं गुरु-समर्पण के भाव से सम्पन्न हुआ।
अपने आशीर्वचन में पूज्य आचार्यश्री जी ने गुरु-तत्त्व, परमात्मा के स्वरूप, साधना की महिमा तथा सनातन ज्ञान-परम्परा का गहन विवेचन किया। उन्होंने कहा कि परमात्मा नित्य, शाश्वत एवं सर्वव्यापक हैं। भगवान ने चतुश्लोकी भागवत के माध्यम से ब्रह्मविद्या का परम रहस्य प्रकट किया तथा सनातन संस्कृति ने “मातृ देवो भव, पितृ देवो भव” जैसे आदर्शों से मानव जीवन को दिशा प्रदान की है।
उन्होंने साधना, श्रद्धा, तप एवं आत्मसमर्पण के महत्व को स्पष्ट करते हुए कहा कि इनके बिना आत्मिक उत्कर्ष सम्भव नहीं। बीज के उदाहरण द्वारा उन्होंने समझाया कि जैसे बीज स्वयं को मिट्टी में समर्पित कर विशाल वृक्ष बनता है, वैसे ही साधक अहंकार का त्याग कर आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करता है।
गुरु-तत्त्व का निरूपण करते हुए उन्होंने भगवान श्रीदक्षिणामूर्ति, भगवान श्रीदत्तात्रेय, महर्षि वेदव्यास तथा भगवत्पाद भाष्यकार भगवान श्री आदि शंकराचार्य की दिव्य परम्परा का स्मरण कराया। उन्होंने कहा कि गुरु कोई सामान्य व्यक्तित्व नहीं, बल्कि ज्ञान की अखण्ड, प्रकाशमान एवं उद्धारकारी सत्ता हैं, जो साधक के अंतःकरण से अज्ञान का अंधकार दूर कर आत्मबोध का प्रकाश प्रज्वलित करती है। “गुरोस्तु मौनं व्याख्यानं शिष्यास्तु छिन्नसंशयाः” का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि गुरु का मौन भी शिष्य के संशयों का समाधान कर देता है।
इस प्रसंग में उन्होंने गोस्वामी तुलसीदास जी की चौपाई “उघरहिं विमल विलोचन हिय के, मिटहिं दोष दुःख भव रजनी के” का उल्लेख करते हुए सद्गुरु-कृपा की महिमा का वर्णन किया। महर्षि वेदव्यास के योगदान का स्मरण करते हुए उन्होंने “व्यासोच्छिष्टं जगत् सर्वम्” का उल्लेख किया तथा कहा कि वेद, उपनिषद्, महाभारत, पुराण और ब्रह्मसूत्र के माध्यम से उन्होंने सम्पूर्ण मानवता को अमूल्य आध्यात्मिक धरोहर प्रदान की।
भगवत्पाद आदि शंकराचार्य द्वारा प्रस्थानत्रयी पर रचित भाष्यों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उपनिषद्, श्रीमद्भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्र का सार आत्मबोध है, जिसका वास्तविक अनुभव सद्गुरु की कृपा और साधना से ही सम्भव है।
पूज्य आचार्यश्री जी ने “मौनं सर्वार्थसाधनम्” का स्मरण कराते हुए मौन को आत्मचिन्तन और अन्तर्मुखता का श्रेष्ठ साधन बताया। उन्होंने कहा कि सतयुग में सत्य, त्रेता में यज्ञ, द्वापर में दान और कलियुग में भगवान के नाम का जप ही मोक्ष का सर्वोत्तम मार्ग है। उन्होंने यह भी बताया कि भगवान के भक्त चार प्रकार के होते हैं—आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी, जिनमें ज्ञानी भक्त उन्हें सर्वाधिक प्रिय होता है।
पूज्य आचार्यश्री जी का यह शास्त्रसम्मत एवं वेदान्तमय उद्बोधन श्रद्धालुओं के लिए गुरु-भक्ति, साधना, आत्मचिन्तन एवं आत्मसाक्षात्कार की दिशा में अनुपम प्रेरणा का स्रोत बना। उपस्थित श्रद्धालुओं ने उनके प्रत्येक वचन को भाव-विभोर होकर आत्मसात किया।
इस अवसर पर देश-विदेश से पधारे असंख्य श्रद्धालुओं, संत-महात्माओं एवं संन्यासियों के साथ प्रतिष्ठित उद्योगपति श्री किशोर काया जी, श्रीमती मधु काया जी, श्री अरविन्द सिंघल जी, श्रीमती विनीता सिंघल जी, आश्रम ट्रस्टी श्री महेन्द्र लाहौरिया जी, श्री प्रवीण चौधरी जी, श्री सोनेराम जी सहित अनेक गणमान्य भक्त उपस्थित रहे।
परम पूज्य महामण्डलेश्वर श्री स्वामी अपूर्वानन्द गिरि जी महाराज, पूज्य श्री स्वामी कैलाशानन्द जी महाराज, पूज्य श्री स्वामी ज्ञानानन्द गिरि जी महाराज, पूज्य श्री स्वामी नित्यानन्द गिरि जी महाराज, पूज्य श्री स्वामी सोमदेव गिरि जी महाराज, पूज्य श्री स्वामी दत्त गिरि जी महाराज तथा अनेक संन्यासी शिष्यों ने गुरुचरणों में अपनी श्रद्धा एवं समर्पण अर्पित किया।

