संतों का सानिध्य और सत्संग ही मानव जीवन की सच्ची साधना : महंत सुयज्ञ मुनि

बाबा हरिहर धाम में भंडारे का आयोजन, संत महापुरुषों ने भक्तों को सेवा, सत्य और सद्कर्म की राह दिखाई

हरिद्वार। भूपतवाला स्थित बाबा हरिहर धाम हरिहर उदासीन आश्रम में भंडारे का आयोजन श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ किया गया। इस अवसर पर संत महापुरुषों के पावन सानिध्य में भक्तजनों ने सेवा, सत्संग एवं प्रसाद ग्रहण कर आध्यात्मिक आनंद प्राप्त किया। आश्रम परिसर में दिनभर भक्ति, श्रद्धा और संत वाणी की पावन धारा प्रवाहित होती रही।

भंडारे के अवसर पर भक्तों को संबोधित करते हुए प्रातः स्मरणीय परम पूज्य गुरुदेव महंत सुयज्ञ मुनि जी महाराज ने कहा कि पृथ्वी लोक पर संत महापुरुषों का पावन सानिध्य, भजन-सत्संग, दान, सत्य और सत्कर्म ही मनुष्य के कल्याण का वास्तविक मार्ग है। यही मार्ग मनुष्य को सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठाकर परमात्मा की ओर ले जाता है और मानव जीवन को सार्थक बनाने का माध्यम बनता है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य को धन, वैभव और सांसारिक सुख-सुविधाओं के पीछे भागने के साथ-साथ अपने आत्मकल्याण का भी चिंतन करना चाहिए। संतों की वाणी का श्रवण, प्रभु का स्मरण और जरूरतमंदों की सेवा मनुष्य के भीतर सद्भाव, करुणा एवं परोपकार की भावना को जागृत करते हैं। जिस जीवन में सत्य, सेवा, दया, दान और धर्म का समावेश हो जाता है, वही जीवन वास्तव में सफल और सार्थक बनता है।

महंत सुयज्ञ मुनि जी महाराज ने कहा कि भजन मन को निर्मल करता है, सत्संग विचारों को पवित्र करता है, दान जीवन में उदारता लाता है और सत्कर्म मनुष्य को ईश्वर के निकट पहुंचाते हैं। संतों का सानिध्य जीवन की दिशा और दशा दोनों बदलने की शक्ति रखता है। इसलिए प्रत्येक मनुष्य को अपने व्यस्त जीवन में कुछ समय प्रभु भक्ति, संत सेवा और सत्संग के लिए अवश्य निकालना चाहिए।

इस अवसर पर उन्होंने भावपूर्ण श्लोक के माध्यम से सत्संग की महिमा बताते हुए कहा—

“सत्संगति: कथय किं न करोति पुंसाम्,
संसार-सिन्धु-तरणे परमं सहायम्।
सद्भावना, सत्कर्म और हरि का नाम,
यही मनुष्य जीवन का सच्चा धाम॥”

उन्होंने कहा कि संतों की शरण में बैठकर प्राप्त होने वाला ज्ञान मनुष्य के भीतर के अज्ञान को दूर करता है। जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश अंधकार को मिटा देता है, उसी प्रकार संत वाणी और प्रभु भक्ति जीवन के अज्ञान, अहंकार एवं विकारों को दूर कर आत्मिक प्रकाश प्रदान करते हैं। मानव जीवन दुर्लभ है, इसलिए इसे केवल भौतिक सुखों में व्यतीत करने के बजाय धर्म, सेवा और परोपकार में लगाना ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

भंडारे में संत महापुरुषों एवं भक्तजनों ने श्रद्धापूर्वक प्रसाद ग्रहण किया। इस दौरान भक्तों ने आश्रम की आध्यात्मिक परंपरा को आगे बढ़ाते हुए सेवा एवं धर्म के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया। आश्रम परिसर में पूरे दिन श्रद्धा और भक्ति का वातावरण बना रहा।

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