त्र्यंबकेश्वर में हर-हर महादेव के जयघोष से गूंजा वातावरण, संतों की एकजुटता ने दिया सनातन धर्म की शक्ति और समरसता का संदेश
हरिद्वार के प्रमुख संतों की गरिमामयी उपस्थिति ने समारोह को बनाया दिव्य एवं ऐतिहासिक
प्राचीन ज्योतिर्लिंग नगरी त्र्यंबकेश्वर में संत-महात्माओं, महंतों और श्रद्धालुओं की उपस्थिति में धर्मध्वजा की भव्य परिक्रमा का आयोजन अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ संपन्न हुआ। हर-हर महादेव के गगनभेदी जयघोष के बीच पूरा वातावरण शिवमय और आध्यात्मिक रंग में रंगा नजर आया। इस दिव्य आयोजन की सबसे खास बात यह रही कि कुंभ मेले से पूर्व विभिन्न अखाड़ों के संत-महंत एक साथ एक मंच पर नजर आए और सभी ने अपनी एकजुटता का परिचय दिया।
इस अवसर पर मनसा देवी मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष एवं श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी के सचिव श्रीमहंत डॉ. रविंद्र पुरी जी महाराज सहित दक्षेश्वर महादेव मंदिर से जुड़े श्रीमहंत रविंद्र पुरी जी महाराज तथा हरिद्वार के अनेक प्रतिष्ठित संत-महात्माओं की गरिमामयी उपस्थिति रही। संत समाज के प्रमुख धर्माचार्यों को एक साथ देखकर श्रद्धालुओं में भी विशेष उत्साह और प्रसन्नता का माहौल दिखाई दिया।
धर्मध्वजा की भव्य परिक्रमा केवल एक धार्मिक परंपरा का निर्वहन नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना और संत समाज की सामूहिक शक्ति का प्रतीक बनकर सामने आई। सभी अखाड़ों के संतों का एक साथ उपस्थित होना इस बात का परिचायक रहा कि सनातन धर्म की परंपराएं एकता, सद्भाव, समर्पण और परमार्थ की भावना से मजबूत होती हैं।
कुंभ से पूर्व संत समाज की इस एकजुटता ने एक सकारात्मक और प्रेरणादायी संदेश दिया है। संतों की आपसी एकता और समरसता निश्चित रूप से सनातन धर्म की गौरवशाली परंपराओं को और अधिक मजबूती प्रदान करेगी। यह दृश्य अपने आप में एक मिसाल रहा, जहां पद, प्रतिष्ठा और अखाड़ों की अलग-अलग परंपराओं से ऊपर उठकर सभी संत एक आध्यात्मिक भावना के साथ एकत्रित दिखाई दिए।
संत समाज की इसी महान भावना को संत कबीरदास जी के प्रसिद्ध दोहे में सुंदर ढंग से व्यक्त किया गया है—
“संत बड़े परमारथी, शीतल जिनके अंग।
तपन बुझावें और की, दे-दे अपनो रंग।।“
इस दोहे का भावार्थ है कि सच्चे संत परमार्थी होते हैं। उनका स्वभाव, विचार और आचरण शीतलता से परिपूर्ण होता है। वे अपने ज्ञान, प्रेम, करुणा और आशीर्वाद से दूसरों के जीवन की परेशानियों, मन की अशांति और दुखों की तपन को दूर करते हैं। संतों का सानिध्य व्यक्ति को भक्ति, सद्भाव और मानवता के रंग में रंग देता है।
त्र्यंबकेश्वर में संत समाज की यह एकजुटता भी इसी आध्यात्मिक भावना का जीवंत उदाहरण बनी। सभी पूज्य संत-महात्माओं के चरणों में नमन करते हुए यही मंगलकामना है कि उनका शीतल चंद्रमा के समान शांत स्वभाव, ज्ञान और आशीर्वाद सदैव समस्त मानव समाज पर बना रहे। संत समाज इसी प्रकार विशाल हृदय के साथ समाज को मार्गदर्शन देता रहे और सनातन धर्म की दिव्य संस्कृति एवं परंपराओं का प्रकाश घर-घर तक पहुंचता रहे।
संतों की एकता ही सनातन की शक्ति है और संतों का आशीर्वाद ही समाज की सबसे बड़ी पूंजी है।






