माँ गंगा के पावन तट पर चौथी बार साकार हो रही माँ शबरी की भक्ति, त्याग और प्रभु श्रीराम के प्रति अनन्य प्रेम की गाथा
ओडिशा और छत्तीसगढ़ के जनजातीय कलाकारों की संगीतमय प्रस्तुति बनी आकर्षण का केंद्र, स्वामी चिदानन्द सरस्वती महाराज ने प्रेम, सेवा और समानता को बताया रामकथा का मूल संदेश
ऋषिकेश, 12 अक्टूबर 2026। माँ गंगा के पावन तट पर स्थित परमार्थ निकेतन में 11 से 15 अक्टूबर तक आयोजित माँ शबरी रामलीला का भव्य एवं भावपूर्ण शुभारंभ किया गया। परमार्थ पीठाधीश्वर परम पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती महाराज, भारतीय जनता पार्टी पंजाब के सह-प्रभारी एवं भारतीय तीरंदाजी संघ के मानद महासचिव श्री वीरेन्द्र सचदेवा, माँ शबरी रामलीला की अध्यक्ष श्री शक्ति बख्शी तथा उपस्थित कलाकारों ने दीप प्रज्वलित कर रामलीला महोत्सव का शुभारंभ किया। सैस फाउंडेशन के तत्वावधान में आयोजित यह महोत्सव भक्ति, समर्पण, सामाजिक समरसता, नारी गरिमा और मानवता के शाश्वत मूल्यों को जन-जन तक पहुँचाने का प्रेरणादायी प्रयास है।
माँ गंगा के तट पर चौथी बार आयोजित हो रही माँ शबरी रामलीला में ओडिशा एवं छत्तीसगढ़ के प्रतिभाशाली आदिवासी और जनजातीय कलाकार संगीतमय नाट्य शैली में रामकथा का सजीव मंचन कर रहे हैं। कलाकारों की भावपूर्ण प्रस्तुतियाँ, लोकसंस्कृति, पारंपरिक संगीत और उत्कृष्ट अभिनय दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर रहे हैं। रामलीला के माध्यम से भारतीय संस्कृति की समृद्ध लोकपरंपराओं को संरक्षित करने और प्रभु श्रीराम के आदर्शों को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का संदेश दिया जा रहा है।
माँ शबरी की भक्ति में निहित है प्रेम और समर्पण का शाश्वत संदेश
माँ शबरी का चरित्र भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में निष्कपट प्रेम, अटूट विश्वास, धैर्य और समर्पण का अनुपम उदाहरण है। वर्षों तक प्रभु श्रीराम के आगमन की प्रतीक्षा करने वाली माँ शबरी ने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि सच्ची भक्ति में न अहंकार होता है और न किसी प्रकार का भेदभाव। उनके द्वारा प्रेमपूर्वक प्रभु श्रीराम को अर्पित किए गए बेर यह दर्शाते हैं कि ईश्वर के लिए बाहरी वैभव से अधिक भक्त के हृदय का निर्मल भाव महत्वपूर्ण है।
प्रभु श्रीराम द्वारा माँ शबरी के प्रेम और समर्पण को स्वीकार करना सामाजिक समानता, मानवीय गरिमा और आध्यात्मिक समरसता का शाश्वत संदेश देता है। यही कारण है कि माँ शबरी की कथा आज भी समाज को प्रेम, सद्भाव और परस्पर सम्मान के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।
भेदभाव से ऊपर है प्रेम और सेवा की भावना : स्वामी चिदानन्द सरस्वती
परमार्थ पीठाधीश्वर परम पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती महाराज ने माँ शबरी की भक्ति के माध्यम से सामाजिक समरसता और मानवीय मूल्यों को आत्मसात करने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि ईश्वर किसी जाति, वर्ग, भाषा, क्षेत्र या सामाजिक पहचान की सीमाओं में बँधे नहीं हैं। प्रभु श्रीराम वहाँ विराजते हैं, जहाँ प्रेम, करुणा, सेवा और सभी को अपनाने का भाव होता है।
उन्होंने कहा कि श्रद्धा और समर्पण के सामने सामाजिक भेदभाव का कोई स्थान नहीं है। रामकथा के आदर्शों को केवल सुनना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि उन्हें अपने जीवन, व्यवहार और सामाजिक व्यवस्था में भी उतारना आवश्यक है। जब समाज के अंतिम व्यक्ति तक सम्मान, अवसर और अपनत्व पहुँचेगा, तभी रामराज्य की भावना वास्तविक रूप में साकार हो सकेगी।
नारी गरिमा और जनजातीय संस्कृति का प्रेरक संगम
माँ शबरी रामलीला नारी शक्ति और नारी गरिमा का भी सशक्त संदेश देती है। माँ शबरी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि आध्यात्मिक ऊँचाई किसी बाहरी पहचान से नहीं, बल्कि अंतःकरण की पवित्रता, दृढ़ विश्वास और निरंतर साधना से प्राप्त होती है। उनका चरित्र कठिन परिस्थितियों में भी अपने विश्वास, मूल्यों और संकल्प पर अडिग रहने की प्रेरणा देता है।
इस आयोजन की विशेषता यह है कि जनजातीय समुदायों के कलाकार अपनी लोकपरंपराओं और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के माध्यम से रामकथा को जीवंत बना रहे हैं। उनकी प्रस्तुतियों में लोकजीवन की सहजता, पीढ़ियों से संजोई गई सांस्कृतिक विरासत और प्रभु श्रीराम के प्रति अटूट श्रद्धा की झलक दिखाई देती है। यह आयोजन भारतीय संस्कृति की उस समावेशी भावना को सशक्त करता है, जिसमें प्रत्येक समुदाय, परंपरा और व्यक्ति के सम्मान को महत्व दिया जाता है।
भक्ति, संस्कृति और मानवीय मूल्यों का दिव्य संगम
माँ गंगा की अविरल धारा के सान्निध्य में आयोजित यह रामलीला केवल धार्मिक कथा का मंचन नहीं, बल्कि वर्तमान समाज के लिए जीवनमूल्यों का पुनर्स्मरण और आने वाली पीढ़ियों के लिए संस्कारों की अमूल्य धरोहर है। प्रत्येक संध्या होने वाली प्रस्तुतियों के माध्यम से श्रद्धालुओं को भक्ति, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना के अद्भुत संगम का अनुभव कराया जा रहा है।
परमार्थ निकेतन में आयोजित यह महोत्सव समाज को प्रेम, सेवा, सद्भाव और एकात्मता के सूत्र में जोड़ने के साथ ही भारतीय संस्कृति की जीवंत परंपरा को आगे बढ़ाने का कार्य कर रहा है। आयोजकों ने श्रद्धालुओं, भक्तों, पर्यटकों और संस्कृति प्रेमियों से इस दिव्य आयोजन में सम्मिलित होकर प्रभु श्रीराम की लीलाओं का आनंद लेने का आह्वान किया है। जो श्रद्धालु प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित नहीं हो सकते, वे परमार्थ निकेतन के आधिकारिक सोशल मीडिया पेजों के माध्यम से भी आयोजन से जुड़ सकते हैं।
कलाकारों और सहयोगियों का रहा विशेष योगदान
माँ शबरी रामलीला महोत्सव को भव्य स्वरूप प्रदान करने में श्री विश्व मोहन शर्मा, श्री मनोज त्यागी, श्री सुमित कुमार, श्री जितेंद्र चौरसिया और डॉ. मुकेश कुमार का महत्वपूर्ण सहयोग रहा। वहीं, अपनी प्रभावशाली प्रस्तुतियों से दर्शकों का मन मोहने वाले कलाकार राहुल, हितेश, चंचल, राहुल परिहार एवं हरमीत सिंह ने अपनी प्रतिभा से आयोजन को विशेष बनाया। रामलीला के सफल मंचन में निदेशक डॉ. अनु, चारू सिंह तथा उपनिदेशक श्री प्रवीण का भी विशेष योगदान रहा।
माँ शबरी रामलीला महोत्सव के माध्यम से परमार्थ निकेतन ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि सच्ची भक्ति का आधार प्रेम, सेवा, करुणा और समर्पण है। माँ शबरी का जीवन और प्रभु श्रीराम के प्रति उनकी अनन्य श्रद्धा समाज को भेदभाव से ऊपर उठकर मानवता तथा समरसता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।






