सनातन धर्म के शास्त्रों में मिलावट और महापुरुषों को बदनाम करने के षड्यंत्र का होगा पर्दाफाश : स्वामी रामदेव बाबा

29 से 31 अक्टूबर तक पतंजलि विश्वविद्यालय में आयोजित होगा 52वां अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलनसम्मेलन में जुटेंगे देश-विदेश के विद्वान, संत-महात्मा और शीर्ष धर्माचार्य; सनातन शास्त्र शुद्धिकरण अभियान का होगा शुभारंभ

हरिद्वार, 28 अक्टूबर। पतंजलि विश्वविद्यालय में 29 से 31 अक्टूबर 2026 तक आयोजित होने वाले 52वें अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन (ऑल इंडिया ओरिएंटल कॉन्फ्रेंस) को लेकर बुधवार को दिव्य योग मंदिर, कृपालु बाग आश्रम, कनखल में प्रेस वार्ता आयोजित की गई। पतंजलि योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण महाराज के सान्निध्य में आयोजित प्रेस वार्ता में योगगुरु स्वामी रामदेव महाराज ने सम्मेलन के उद्देश्यों, सनातन धर्म के मूल स्वरूप के संरक्षण तथा शास्त्रों के प्रामाणिक अध्ययन और प्रकाशन की आवश्यकता पर विस्तार से विचार रखे।स्वामी रामदेव ने कहा कि सनातन धर्म, उसके आराध्य देवी-देवताओं, अवतारी महापुरुषों और ऋषि-मुनियों के चरित्र को लेकर भ्रामक व्याख्याएं प्रस्तुत किए जाने से धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति भ्रम पैदा होता है। उन्होंने आरोप लगाया कि सनातन धर्म के कुछ ग्रंथों में प्रक्षेप यानी मिलावट और उनकी गलत व्याख्याओं के माध्यम से भारतीय संस्कृति को बदनाम करने का प्रयास किया गया है। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित सम्मेलन में इन विषयों पर विद्वानों के बीच गंभीर शास्त्रीय विमर्श होगा और सनातन शास्त्र शुद्धिकरण अभियान की शुरुआत की जाएगी।शास्त्रों के प्रामाणिक स्वरूप की पहचान पर जोरस्वामी रामदेव ने कहा कि भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा की वास्तविक समझ के लिए प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन मूल स्रोतों, भाषायी ज्ञान और प्रमाणिक संदर्भों के आधार पर किया जाना चाहिए। उन्होंने मनुस्मृति, विभिन्न स्मृति ग्रंथों, ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यकों, पुराणों, रामायण और महाभारत सहित अनेक ग्रंथों की व्याख्याओं की समीक्षा की आवश्यकता जताई। उनके अनुसार, संस्कृत में लिखी प्रत्येक रचना को बिना परीक्षण के प्रामाणिक शास्त्र मान लेना उचित नहीं है।उन्होंने कहा कि सनातन धर्म के मूल सिद्धांत सत्य, न्याय, समानता, मानवता और समस्त सृष्टि के कल्याण की भावना पर आधारित हैं। शास्त्रों के नाम पर प्रचलित भ्रामक व्याख्याओं की पहचान कर प्रामाणिक सामग्री को सामने लाना समय की आवश्यकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सम्मेलन का उद्देश्य सनातन धर्म की मूल शिक्षाओं को विद्वत्तापूर्ण विमर्श के माध्यम से समाज और दुनिया के सामने प्रस्तुत करना है।जाति और लिंग के आधार पर भेदभाव का किया विरोधस्वामी रामदेव ने कहा कि सनातन धर्म की मूल भावना किसी भी जाति, वर्ग अथवा लिंग के प्रति अपमान या भेदभाव की नहीं है। उन्होंने कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था की व्याख्या करते हुए कहा कि व्यक्ति की पहचान उसके आचरण, गुण और कर्म से होनी चाहिए। उनके अनुसार, नारी सम्मान, सामाजिक समरसता और सभी मनुष्यों के प्रति समान दृष्टि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के महत्वपूर्ण आधार हैं।उन्होंने कहा कि समाज में जाति और वर्ग के नाम पर खड़ी की गई भेदभाव की दीवारों को समाप्त कर आपसी सद्भाव, एकता और समरसता को मजबूत करना चाहिए। उन्होंने वेदों और सनातन परंपरा के मूल संदेशों का अध्ययन करते हुए सामाजिक एकता को बढ़ावा देने का आह्वान किया।शास्त्रों के पुनरीक्षण और प्रामाणिक प्रकाशन की बनेगी योजनास्वामी रामदेव ने बताया कि सनातन धर्म के प्राचीन ग्रंथों, उपनिषदों, दर्शनों, स्मृतियों, पुराणों, रामायण और महाभारत के विभिन्न संस्करणों तथा भाष्यों के अध्ययन और समीक्षा के लिए विद्वानों की समिति गठित करने की योजना है। उन्होंने कहा कि ग्रंथों में संभावित प्रक्षेपों और गलत व्याख्याओं की पहचान प्रमाणों तथा शास्त्रीय विमर्श के आधार पर की जानी चाहिए।उन्होंने कहा कि भविष्य में विभिन्न संस्थानों के माध्यम से प्रामाणिक ग्रंथों के प्रकाशन की दिशा में काम किया जाएगा। इसके साथ ही संस्कृत भाषा, व्याकरण, निरुक्त, दर्शन और मूल ग्रंथों का पर्याप्त ज्ञान रखने वाले विद्वानों द्वारा ही शास्त्रों की व्याख्या किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि अभियान का उद्देश्य प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रामाणिक स्वरूप को सामने लाना और भावी पीढ़ियों तक उसका सही ज्ञान पहुंचाना है।सनातन संस्कृति के वैश्विक संदेश को सामने लाने का आह्वानस्वामी रामदेव ने कहा कि भारत की प्राचीन ऋषि परंपरा ने विश्व को योग, आयुर्वेद, दर्शन, आध्यात्मिकता और वसुधैव कुटुंबकम् जैसी व्यापक मानवीय अवधारणाएं दी हैं। उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा के सार्वभौमिक संदेश को समझने और उसके मूल सिद्धांतों का अध्ययन करने में विश्वभर के लोगों की रुचि बढ़ रही है।उन्होंने भारतीय समाज से अपनी संस्कृति, परंपराओं और पूर्वजों के योगदान को समझने तथा प्रमाणिक ज्ञान के आधार पर अपनी विरासत पर गौरव करने का आह्वान किया। उनके अनुसार, सनातन धर्म के विषय में प्रचलित भ्रांतियों का समाधान भावनात्मक आरोप-प्रत्यारोप के बजाय तथ्यपरक अध्ययन और शास्त्रीय प्रमाणों के माध्यम से किया जाना चाहिए।52वें अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन में जुटेंगे देश-विदेश के विद्वान29 से 31 अक्टूबर तक पतंजलि विश्वविद्यालय में आयोजित होने वाले इस तीन दिवसीय सम्मेलन में देश के प्रमुख संस्कृत विद्वानों, दार्शनिकों, संत-महात्माओं और धर्माचार्यों के शामिल होने की संभावना है। स्वामी रामदेव के अनुसार, विभिन्न शंकराचार्यों, शैव और वैष्णव परंपराओं के संतों, अखाड़ा परिषद, षड्दर्शन साधु समाज, आचार्य महासभा तथा अखिल भारतीय संत समिति से जुड़े प्रतिनिधियों को भी आमंत्रित किया गया है।उन्होंने बताया कि सम्मेलन में लगभग चार से पांच हजार संस्कृत विद्वानों और सैकड़ों आध्यात्मिक विभूतियों के भाग लेने की अपेक्षा है। सम्मेलन का उद्घाटन राज्यपाल द्वारा किए जाने की जानकारी भी दी गई। आयोजकों के अनुसार, यह आयोजन सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और शैक्षणिक विमर्श पर केंद्रित रहेगा तथा इसे गैर-राजनीतिक स्वरूप में आयोजित किया जाएगा।सम्मेलन में स्वामी रामदेव महाराज, आचार्य बालकृष्ण महाराज, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी, पतंजलि विश्वविद्यालय की प्रति-कुलपति डॉ. साध्वी देवप्रिया, अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन की महासचिव प्रो. कविता होले, संयुक्त सचिव प्रो. शिवानी वी., प्रो. अरुण रंजन मिश्रा, प्रो. रमाकांत पाण्डेय और श्री मयंक अग्रवाल सहित देश-विदेश के प्रतिष्ठित विद्वानों की सहभागिता प्रस्तावित है।स्वामी रामदेव ने कहा कि 52वें अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन के माध्यम से सनातन धर्म के मूल स्वरूप, भारतीय ज्ञान परंपरा और प्राचीन ग्रंथों के प्रामाणिक अध्ययन को लेकर व्यापक चर्चा होगी। उन्होंने विश्वास जताया कि विद्वानों के सामूहिक प्रयासों से भारतीय संस्कृति की समृद्ध विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने और उसके प्रति फैली भ्रांतियों के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण पहल होगी।

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