श्रीमद्भागवत कथा के अमृतपान से भक्तिमय हुआ भूपतवाला

श्रीमद्भागवत कथा के अमृतपान से भक्तिमय हुआ भूपतवाला
स्वामी अखंडानंद सरस्वती जी महाराज की अमृतवाणी से श्रद्धालु हो रहे कृतार्थ, कथा स्थल पर गूंज रहे राधे-राधे के जयघोष
हरिद्वार। विश्व प्रसिद्ध पावन नगरी हरिद्वार के भूपतवाला स्थित प्रसिद्ध श्री अग्रवाल भवन में इन दिनों भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक चेतना का अद्भुत वातावरण बना हुआ है। यहां प्रातः स्मरणीय परम पूज्य स्वामी श्री अखंडानंद सरस्वती जी महाराज के श्रीमुख से श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ का पावन आयोजन किया जा रहा है। कथा के अमृतमयी प्रसंगों का श्रवण करने के लिए देश के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु पहुंच रहे हैं और भगवान की भक्ति में भावविभोर होकर अपने जीवन को धन्य एवं कृतार्थ कर रहे हैं।
भागवत केवल ग्रंथ नहीं, अंतर्मन को प्रकाशित करने वाला दिव्य प्रकाश
कथा के प्रथम दिवस स्वामी अखंडानंद सरस्वती जी महाराज ने श्रीमद्भागवत के महात्म्य को सरल, सरस एवं भावपूर्ण शैली में समझाते हुए कहा कि भागवत केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर सोई आध्यात्मिक चेतना को जागृत करने वाला दिव्य प्रकाश है। जब मनुष्य मोह-माया में उलझकर अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है, तब भगवान की कथा उसे पुनः अपने भीतर लौटने का मार्ग दिखाती है।
महाराज श्री ने एक सुंदर दृष्टांत के माध्यम से समझाया कि एक व्यक्ति जीवनभर धन, पद, प्रतिष्ठा और सांसारिक सुखों की प्राप्ति के लिए भागता रहा। जीवन की संध्या बेला में उसके पास संसार की अनेक उपलब्धियां थीं, लेकिन मन में शांति नहीं थी। इसी दौरान उसे एक संत का सान्निध्य मिला। संत ने उससे कहा कि उसने जीवनभर संसार को पाने का प्रयास किया, अब कुछ समय प्रभु को पाने का प्रयास करे।
भगवान की कथा के श्रवण से उसके अंतर्मन का अंधकार धीरे-धीरे दूर होने लगा और उसे अनुभूति हुई कि जिस सुख को वह संसार में खोज रहा था, उसका वास्तविक स्रोत प्रभु के नाम, प्रेम और सेवा में ही है।
भक्ति के साथ करुणा और सेवा को जीवन का आधार बनाने का संदेश
महाराज श्री ने श्रद्धालुओं से कहा कि मनुष्य का जीवन तभी सार्थक है, जब उसके हृदय में भगवान के प्रति भक्ति और प्राणी मात्र के प्रति करुणा हो। कथा श्रवण तभी सफल माना जा सकता है, जब उसका संदेश हमारे व्यवहार में दिखाई दे और हमारा जीवन प्रेम, सहयोग, परोपकार एवं सेवा का माध्यम बने।
कथा के दौरान श्रद्धालु भक्ति में पूरी तरह सराबोर दिखाई दिए। वातावरण लगातार ‘राधे-राधे’ और ‘श्रीकृष्ण भगवान की जय’ के जयघोष से गूंजता रहा।
श्रद्धालुओं ने बताया आध्यात्मिक शांति का अनुपम अनुभव
कथा में पहुंचे श्रद्धालुओं ने महाराज श्री की अमृतवाणी को अपने जीवन के लिए प्रेरणादायी बताया।
श्री राधा कृष्ण जी, उड़ीसा ने कहा कि भागवत कथा सुनकर ऐसा अनुभव होता है, जैसे मन को प्रभु के चरणों में विश्राम मिल गया हो। प्रत्येक प्रसंग जीवन को नई दिशा देता है।
श्री मोहनलाल सिंगला जी, गुड़गांव ने कहा कि महाराज श्री की वाणी में अद्भुत आध्यात्मिक शक्ति है। कथा श्रवण करते-करते मन में भक्ति और सेवा का भाव स्वतः जागृत होने लगता है।
श्री रोशन लाल जी ने कहा कि भागवत का प्रत्येक प्रसंग जीवन को बेहतर बनाने की सीख देता है। हरिद्वार की पावन धरती पर कथा श्रवण करना स्वयं में सौभाग्य है।
श्री पुरुषोत्तम मित्तल जी ने कहा कि संसार की भागदौड़ के बीच भागवत कथा मनुष्य को आत्मिक शांति प्रदान करती है और प्रभु का नाम ही जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है।
श्रीमती लक्ष्मी देवी जी ने कहा कि कथा के शब्द हृदय में उतरकर जीवन के संस्कारों को जागृत करते हैं। प्रभु भक्ति के साथ मानव सेवा का संकल्प ही सच्ची साधना है।
श्रावणी जी ने कहा कि श्रीमद्भागवत प्रेम, करुणा और समर्पण का मार्ग दिखाती है। भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में मन लग जाए तो जीवन स्वयं पावन हो जाता है।
श्री श्याम सुंदर श्रावणी जी ने कहा कि महाराज श्री के श्रीमुख से कथा सुनना आध्यात्मिक सौभाग्य है। भागवत मनुष्य को अहंकार छोड़कर प्रेम और सद्भाव से जीने की प्रेरणा देती है।
सविता मित्तल जी ने कहा कि भागवत कथा के प्रत्येक शब्द में जीवन को बदलने की शक्ति है। कथा के साथ सेवा और सदाचार को अपना लेना ही सच्ची भक्ति है।
रजनी गुप्ता जी ने कहा कि हरिद्वार की पावन धरा पर भागवत श्रवण से मन में अद्भुत शांति का अनुभव हो रहा है।
विनोद जी एवं चंद्रकला जी ने कहा कि भागवत कथा परिवार और समाज में प्रेम एवं संस्कारों की ज्योति प्रज्वलित करती है। प्रभु की कथा के साथ सेवा का भाव जीवन को वास्तविक अर्थ प्रदान करता है।
सुराणा जी ने कहा कि कथा का प्रत्येक प्रसंग जीवन की क्षणभंगुरता और प्रभु नाम की शाश्वतता का स्मरण कराता है। इसलिए प्रत्येक क्षण सद्कर्म और सेवा में लगाना चाहिए।
श्रीमती सुशीला जाखड़ जी ने कहा कि भागवत कथा मनुष्य के भीतर करुणा और विनम्रता का भाव जगाती है। दूसरों के दुख को अपना समझकर उनकी सहायता करना ही प्रभु की सच्ची पूजा है।
श्री श्याम सुंदर सराफ जी ने कहा कि महाराज श्री की अमृतवाणी से भागवत का ज्ञान हृदय को स्पर्श कर रहा है। भक्ति तभी पूर्ण है, जब उसके साथ मानवता और सेवा का भाव जुड़ा हो।
श्री पुरुषोत्तम मित्तल जी ने कहा कि प्रभु की कथा मनुष्य को भीतर से समृद्ध बनाती है। जीवन में प्रेम, सद्भाव और सेवा को स्थान देकर ही भगवान की कृपा के सच्चे अधिकारी बना जा सकता है।
भागवत सेवा समिति के सेवा कार्यों की भी हो रही सराहना
श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ का आयोजन भागवत सेवा समिति के तत्वावधान में किया जा रहा है। समिति द्वारा धार्मिक आयोजनों के साथ सेवा के क्षेत्र में भी निरंतर कार्य किए जाते रहे हैं। श्री नेमीशरण तीर्थ में समिति की ओर से गौशाला एवं मंदिर निर्माण जैसे पुनीत कार्य भी कराए गए हैं। समिति का उद्देश्य धार्मिक एवं आध्यात्मिक आयोजनों के माध्यम से श्रद्धालुओं को सनातन संस्कृति, भक्ति और सेवा के संदेश से जोड़ना है।
कथा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। इनमें मंजू मित्तल, सीता देवी, मोहिनी देवी, सरोज गोयल, अंजु गोयल, कमलेश मित्तल, डॉ. गौरी शंकर जी मित्तल, महेश गोयल, महेंद्र गोयल, रोशन लाल पंसारी सहित भारी संख्या में भक्तजन शामिल रहे।
कथा के प्रथम दिवस का समापन भक्ति और भाव-विभोर वातावरण में हुआ। श्रद्धालुओं ने संकल्प लिया कि वे श्रीमद्भागवत के संदेश को केवल सुनेंगे ही नहीं, बल्कि उसे अपने आचरण में भी उतारेंगे।
भागवत कथा का मूल संदेश यही है कि प्रेम, करुणा, परोपकार और सेवा को जीवन का आधार बनाया जाए। जरूरतमंद के चेहरे पर मुस्कान लाना, दुखी के आंसू पोंछना और असहाय का हाथ थामना ही भक्ति को मानवता का वास्तविक स्वरूप प्रदान करता है। यही प्रभु श्री राधा-कृष्ण की भक्ति का सच्चा संदेश और मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता है।

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