गुस्से में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने 11 दिन बाद छोड़ा प्रयागराज, जाते-जाते कह गए अहम बातें

ज्योतिषपीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज जी माघ मास में पवित्र स्नान किए बिना ही प्रयागराज से रवाना हो गए। उनके इस निर्णय के पीछे प्रशासन पर लगाए गए गंभीर आरोप और गहरी नाराज़गी बताई जा रही है।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने आरोप लगाया कि प्रशासनिक हमले द्वारा उनके साथ आए बटुक ब्राह्मणों के साथ दुर्व्यवहार किया गया। उन्होंने कहा कि ब्राह्मणों की शिखा खींची गई, उनके साथ मारपीट हुई और यह कृत्य न केवल बटुक ब्राह्मणों का, बल्कि संपूर्ण ब्राह्मण समाज और शंकराचार्य परंपरा का अपमान है।
उन्होंने कहा कि इतनी गंभीर घटना के बावजूद अब तक किसी भी जिम्मेदार अधिकारी या कर्मी के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। इसी से आहत होकर उन्होंने माघ मास के दौरान संगम स्नान न करने का कठोर निर्णय लिया।
प्रयागराज से प्रस्थान करते समय शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा,
“जब धर्माचार्यों और ब्राह्मणों का सम्मान सुरक्षित नहीं है, तो ऐसे स्थान पर धार्मिक अनुष्ठान करना आत्मसम्मान के विरुद्ध है। यह केवल मेरा नहीं, सनातन परंपरा का अपमान है।”
शंकराचार्य के इस कदम से धार्मिक और सामाजिक हलकों में हलचल मच गई है। कई संत संगठनों और ब्राह्मण समाज से जुड़े लोगों ने घटना की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है।
फिलहाल प्रशासन की ओर से इस पूरे मामले पर कोई विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन घटना ने माघ मास के दौरान प्रयागराज में व्यवस्था और संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं
सूत्रों के अनुसार, प्रयागराज में अपने प्रवास के दौरान शंकराचार्य कई धार्मिक और सामाजिक आयोजनों में शामिल हुए थे। इसी दौरान कुछ मुद्दों पर उनकी आपत्तियाँ सामने आईं, जिनमें सनातन परंपराओं, धार्मिक व्यवस्थाओं और निर्णय प्रक्रिया को लेकर असहमति बताई जा रही है। कहा जा रहा है कि इन विषयों पर उनकी बातों को अपेक्षित गंभीरता नहीं मिलने से वे असंतुष्ट थे।
प्रयागराज से रवाना होते समय शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने संकेतात्मक लेकिन सख़्त शब्दों में कहा कि धर्म और परंपरा से जुड़े विषयों में किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि सनातन मूल्यों की उपेक्षा होती रही, तो वे चुप नहीं रहेंगे और खुलकर अपनी बात रखेंगे।
उनके इस बयान के बाद समर्थकों में जहां नाराज़गी को लेकर सहमति दिखाई दी, वहीं कुछ वर्गों ने इसे संवाद की कमी का परिणाम बताया। धार्मिक विशेषज्ञों का मानना है कि शंकराचार्य का यह रुख आने वाले समय में बड़े विमर्श को जन्म दे सकता है।

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