हरिद्वार प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस वार्ता में विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष श्री आलोक जी ने मंदिरों में अहिंदू प्रवेश को लेकर अपनी बात स्पष्ट रूप से रखी। उन्होंने कहा कि अहिंदू प्रवेश निषेध का अर्थ यह नहीं है कि किसी व्यक्ति विशेष का विरोध किया जा रहा है, बल्कि यह पूरी तरह से आस्था और श्रद्धा से जुड़ा विषय है।
श्री आलोक जी ने कहा कि हरिद्वार एक तीर्थ नगरी है, जहां मंदिर हैं और मंदिर किसी भी प्रकार का पर्यटन स्थल नहीं होते। यदि किसी व्यक्ति में ईश्वर के प्रति श्रद्धा भाव नहीं है और वह आस्था नहीं रखता, तो उसका मंदिर में प्रवेश निषेध होना चाहिए। वहीं, यदि कोई व्यक्ति ईश्वर में आस्था रखता है और श्रद्धा भाव के साथ आता है, तो वह मंदिर में प्रवेश कर सकता है—चाहे वह किसी भी संप्रदाय से जुड़ा हो।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अन्य धर्मों और संप्रदायों में भी ऐसे कई पवित्र स्थल हैं, जहां बाहरी संप्रदायों के लोगों का प्रवेश निषेध है। मुस्लिम समुदाय में भी कुछ ऐसे स्थान हैं, जहां केवल मुस्लिम ही जा सकते हैं और अन्य लोगों का प्रवेश वर्जित है। हम उनके धर्म, परंपराओं और पूजा पद्धति का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार मंदिरों की मर्यादा को भी समझा और स्वीकार किया जाना चाहिए।
प्रेस वार्ता के दौरान उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मंदिरों में प्रसाद, पूजा सामग्री या अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं के निर्माण में सभी समुदायों का सहयोग रहता है। इस कार्य में हिंदू, मुस्लिम या अन्य किसी भी संप्रदाय के लोग समान रूप से योगदान देते हैं और आगे भी देते रहेंगे। यह विषय मंदिर परिसर में प्रवेश से अलग है।
श्री आलोक जी ने धर्म परिवर्तन के विषय पर भी अपनी बात रखते हुए कहा कि जिन लोगों ने हिंदू धर्म छोड़कर अन्य धर्म अपनाए हैं, उनसे वे आग्रह करते हैं कि वे अपने मूल सनातन धर्म में वापस लौटें। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म से बड़ा कोई धर्म नहीं है और यह मानवता, सह-अस्तित्व और आस्था का सबसे प्राचीन मार्ग है।
प्रेस वार्ता के अंत में उन्होंने कहा कि मंदिरों की पवित्रता, मर्यादा और धार्मिक भावनाओं का सम्मान सभी को करना चाहिए, तभी समाज में आपसी समझ और सौहार्द बना रह सकता है।
मंदिर पर्यटन स्थल नहीं, आस्था का केंद्र हैं: अहिंदू प्रवेश पर रखी स्पष्ट बात

